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आजम ने माफी नहीं मांगी तो सदस्यता जा सकती है; 41 साल पहले विशेषाधिकार हनन मामले में इंदिरा गांधी को जेल जाना पड़ा था

  • 1978 में चौधरी चरण सिंह के विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पर इंदिरा गांधी को लोकसभा से निष्कासित कर दिया गया था
  • इससे पहले 1976 में सुब्रमण्यम स्वामी को विशेषाधिकार हनन के मामले में राज्यसभा से निष्कासित किया गया था

Dainik Bhaskar

Jul 26, 2019, 05:58 PM IST

नई दिल्ली. समाजवादी पार्टी के सांसद आजम खान ने गुरुवार को भाजपा सांसद और लोकसभा की पीठासीन अधिकारी रमा देवी पर अभद्र टिप्पणी कर दी। उनकी टिप्पणी पर शुक्रवार को भी लोकसभा में हंगामा हुआ। स्पीकर ओम बिड़ला और विपक्ष सदन में आजम के माफीनामे की मांग पर राजी हो गए हैं। ऐसा न होने पर आजम के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाया जा सकता है। ऐसा होता है तो उन्हें सदन से निलंबित या निष्कासित किया जा सकता है। 1978 में विशेषाधिकार हनन से जुड़े मामले में ही पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को लोकसभा से निष्कासित कर जेल भेज दिया गया था। सांसदों के विशेषाधिकार से जुड़े नियमों के बारे में जानने के लिए भास्कर एप ने पूर्व लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन और संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप से बात की। 

आजम खान माफी मांग लें तो मामला यहीं खत्म हो जाएगा, वरना सदस्यता जा सकती है
संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप बताते हैं कि ये संसद के विशेषाधिकार हनन और सदन की अवमानना का मामला बनता है। संसदीय प्रणाली में ऐसे बयानों पर अगर क्षमा मांग ली जाती है तो मामला खत्म कर दिया जाता है। सांसद को चाहिए कि वे बिना शर्त माफी मांग लें। ऐसा न होने पर या तो सदन कार्रवाई का निर्णय ले सकता है या इसे विशेषाधिकार समिति को भेज सकता है। ऐसा होने पर समिति सांसद के बारे में फैसला करती है और उस फैसले से संसद को अवगत कराती है। इसके बाद सदन ही समिति के निर्णय पर मुहर लगाता है। विशेषाधिकार हनन का दोषी पाए जाने पर सांसद को निलंबित किया जा सकता है या सदन से बहिष्कृत किया जा सकता है। 

स्पीकर ही फैसला लेंगे : सुमित्रा महाजन

पूर्व लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन बताती हैं कि आजम खान को लोकसभा की मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए था। उन्हें तुरंत माफी मांगनी चाहिए। ये संसद के विशेषाधिकार हनन का मामला है। इस पर आगे फैसला स्पीकर ही ले सकते हैं।

इंदिरा गांधी को जेल जाना पड़ा था 

  • आपातकाल के बाद 1978 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ तत्कालीन गृह मंत्री चौधरी चरण सिंह ने विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश किया था। आपातकाल की जांच के लिए गठित जस्टिस शाह कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर यह प्रस्ताव पेश किया गया था। सदन में प्रस्ताव मंजूर होने पर इंदिरा को सदन से निष्कासित कर दिया गया था। संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप बताते हैं कि इंदिरा को इस कारण जेल भी जाना पड़ा था।
  • 1976 में सुब्रमण्यम स्वामी के खिलाफ राज्यसभा में विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव पेश किया गया था। स्वामी पर आरोप था कि उन्होंने देश-विरोधी गतिविधियों में शामिल विदेशी प्रकाशकों को दिए अपने इंटरव्यू के जरिए सदन को अपमानित किया है। सदन से प्रस्ताव मंजूर होने के बाद स्वामी को सदन से निष्कासित कर दिया गया था।

क्या है विशेषाधिकार हनन?
संसद सदस्यों और समितियों को कुछ विशेषाधिकार दिए गए हैं, ताकि वे स्वतंत्र और प्रभावी तरीके से अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें। अगर किसी संसद सदस्य या बाहरी व्यक्ति या संस्था द्वारा इन अधिकारों का हनन किया जाता है तो वह सदन की अवमानना और विशेषाधिकार हनन के दायरे में आता है। ऐसे में सदन का कोई भी सदस्य उस सांसद या बाहरी व्यक्ति के खिलाफ सदन में विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पेश कर सकता है।

सदन की अवमानना और विशेषाधिकार हनन पर दंड के प्रावधान

  • सदन की अवमानना या विशेषाधिकार के अब तक कई मामले हुए हैं। अगर किसी व्यक्ति या संस्थान को विशेषाधिकार हनन या सदन की अवमानना का दोषी पाया जाता है तो फिर यह सदन पर निर्भर करता है कि वह उसे माफ करे, चेतावनी देकर छोड़ दे या जेल में भेजे। 1967 में दो व्यक्तियों को राज्यसभा की विजिटर गैलरी से पैम्पलेट फेंकने के कारण जेल भेज दिया गया था। 
  • 2008 में ऊर्दू मैगजीन के एक संपादक को राज्यसभा के उपसभापति के लिए गलत शब्द का उपयोग करने पर विशेषाधिकार हनन का दोषी माना गया था, लेकिन समिति ने दंड देने की बजाय संपादक को यह कहकर छोड़ दिया था कि बेहतर होगा कि सदन अपनी गरिमा का ध्यान रखे और फालतू की लोकप्रियता पाने के लिए लिखे गए ऐसे लेखों को नजरअंदाज करे। 
  • 2007 में राजदूत रोनेन सेन पर आरोप लगा कि उन्होंने सांसदों को ‘हेडलेस चिकन’ कहा था। उनके खिलाफ लाए गए विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पर भी कोई एक्शन नहीं लिया गया, क्योंकि जांच कमिटी ने पाया कि यह शब्द सेन ने सांसदों के लिए नहीं कहा था।

विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव की प्रक्रिया

  • लोकसभा के नियम 222 के तहत सदन का कोई भी सदस्य अध्यक्ष की अनुमति से किसी दूसरे सदस्य के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव ला सकता है। जो सदस्य विशेषाधिकार का प्रश्न उठाना चाहता है, उसे उसी दिन इसकी लिखित सूचना सुबह 10 बजे से पहले लोकसभा महासचिव को देनी होती है। अगर सूचना 10 बजे के बाद दी जाती है, तो उस पर अगले दिन विचार होता है।
  • लोकसभा में किसी सदस्य के खिलाफ विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव लाए जाने के बाद यह लोकसभा अध्यक्ष पर निर्भर करता है कि वे इसकी अनुमति दें या नहीं दें। अगर लोकसभा अध्यक्ष को लगता कि यह प्रस्ताव नियमों के तहत नहीं है, तो वे उसे वहीं खारिज कर सकते हैं। लेकिन लोकसभा अध्यक्ष को लगता है कि यह नियमों के अनुकूल है तो वे अनुमति दे देते हैं। 
  • इस प्रस्ताव पर अध्यक्ष की अनुमति मिलने के बाद भी आपत्ति आती है तो संसद के कम से कम 25 सदस्यों को खड़े होकर इस पर आपत्ति जतानी होती है, अन्यथा इस प्रस्ताव को जांच-पड़ताल के लिए विशेषाधिकार समिति को भेज दिया जाता है।
  • लोकसभा की विशेषाधिकार समिति में 15 सदस्य होते हैं जबकि राज्यसभा की समिति में 10 सदस्य होते हैं। इस समिति का अध्यक्ष सत्ताधारी पार्टी का सांसद होता है। इस समिति में सभी पार्टियों के सांसदों को शामिल किया जाता है। हालांकि, किस पार्टी के कितने सांसद इसमें होंगे, यह उनकी संख्या पर निर्भर करता है। 
  • विशेषाधिकार समिति का काम प्रस्ताव पर जांच-पड़ताल करना है। इसके बाद समिति अपनी सिफारिशें देती है। सिफारिशों पर सदन में बहस भी होती है।

Source: bhaskar.com

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